श्री हरि भक्ति न जानहीं, मायाही सौं हेत।
जीवत ह्वै हैं पातकी, मरिकैं ह्वै हैं प्रेत॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (69)
जिन्होंने श्री हरि-भक्ति के अमूल्य धन को नहीं जाना और माया (संसार तथा संसारी जनों) को ही अपना माना, वे जीवित रहते हुए सदा पापी ही रहते हैं और मृत्यु के उपरांत भी उन्हें प्रेत योनि की ही प्राप्ति होती है।
जीवत ह्वै हैं पातकी, मरिकैं ह्वै हैं प्रेत॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (69)
जिन्होंने श्री हरि-भक्ति के अमूल्य धन को नहीं जाना और माया (संसार तथा संसारी जनों) को ही अपना माना, वे जीवित रहते हुए सदा पापी ही रहते हैं और मृत्यु के उपरांत भी उन्हें प्रेत योनि की ही प्राप्ति होती है।

