वृन्दावनवारी प्यारी अरज हमारी ये ही - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (77)

वृन्दावनवारी प्यारी अरज हमारी ये ही - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (77)

(कवित्त)
वृन्दावनवारी प्यारी अरज हमारी ये ही,
दया की निधान एती बिनै कान कीजिये। [1]
और जग जाल के न ख्याल में बिहाल करौ,
उर प्रतिपाल नेह कुंज में ढरीजिये॥ [2]
‘लाल बलबीर' दासी आपनी खवासी जान,
कछू सुखरासी जू टहल माहिं लीजिये। [3]
चरन सरोजन सों नेह रहै आठौं जाम,
और सों न काम बास वृन्दावन दीजिये। [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (77)

हे वृंदावन वारी प्यारी, हे दया की निधान श्री राधे, हमारी इतनी सी विनती आप सुनिए। [1]

हे प्रतिपाल, हमें संसार के मिथ्या जग जाल से मुक्त कर अपनी कुंज में स्थान दीजिए। [2]

श्री लाल बलबीर दासी कहती हैं कि हे सुखराशी, मुझे अपनी सेविका जान, अपने महल की टहल प्रदान कीजिए। [3]

हे सुकुमारी, मेरा प्रेम केवल और केवल आपके चरण कमल से ही नित्य रहे (आठों याम) और किसी और से कोई काम न रहे, और वृंदावन में नित्य वास मिले। [4]