(राग गौरी)
राधा रसिक कुंजबिहारी खेलत फाग
सब जुवती जन कहत हो हो होरी। [1]
भरत परस्पर काहू की काहू न सुधि
हँसिकैं मन हरत मोहन गोरी॥ [2]
कर सौं करब जोरि कटि सौं कटिब मोरि
करत नृत्य काहू न रुचि थोरी। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा फिरत न्यारेई न्यारे
सब सखियनि की दृष्टि बचावत तकितब खोरी॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (105)
आज श्री राधा कृष्ण सखियों संग होली (फाग) खेल रहे हैं, सब सखियाँ ‘होहोहोरी’ कह रही हैं । [1]
सब एक दूसरे पर रंग डाल रहे हैं, किसी को किसी की भी सुधि नहीं है। श्री राधा कृष्ण ने अपनी मुस्कान से समस्त सखियों का हृदय मोह लिया है । [2]
श्री राधा कृष्ण कर से कर, कटि से कटि स्पर्श कराकर नृत्य कर रहे हैं। किसी की रुचि भी काम नहीं हो रही अर्थात् रस बढ़ता ही जा रहा है । [3]
श्री हरिदासी सखी कहती हैं कि अब श्री राधा कृष्ण, सखियों की नज़रों से बच बच कर एकांत कुंज की खोज में विचरण कर रहे हैं । [4]
राधा रसिक कुंजबिहारी खेलत फाग
सब जुवती जन कहत हो हो होरी। [1]
भरत परस्पर काहू की काहू न सुधि
हँसिकैं मन हरत मोहन गोरी॥ [2]
कर सौं करब जोरि कटि सौं कटिब मोरि
करत नृत्य काहू न रुचि थोरी। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा फिरत न्यारेई न्यारे
सब सखियनि की दृष्टि बचावत तकितब खोरी॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (105)
आज श्री राधा कृष्ण सखियों संग होली (फाग) खेल रहे हैं, सब सखियाँ ‘होहोहोरी’ कह रही हैं । [1]
सब एक दूसरे पर रंग डाल रहे हैं, किसी को किसी की भी सुधि नहीं है। श्री राधा कृष्ण ने अपनी मुस्कान से समस्त सखियों का हृदय मोह लिया है । [2]
श्री राधा कृष्ण कर से कर, कटि से कटि स्पर्श कराकर नृत्य कर रहे हैं। किसी की रुचि भी काम नहीं हो रही अर्थात् रस बढ़ता ही जा रहा है । [3]
श्री हरिदासी सखी कहती हैं कि अब श्री राधा कृष्ण, सखियों की नज़रों से बच बच कर एकांत कुंज की खोज में विचरण कर रहे हैं । [4]

