हमारी संपति दंपति केलि - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.5)

हमारी संपति दंपति केलि - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.5)

हमारी संपति दंपति केलि।
दिन दिन बडत घटत नाही, सुख सागर की रेल।। (1)
अतुलित, अमित, अनुपम, अद्भुत, रस की ठेलाठेल।
भगवतरसिक दृगन में दीनों श्यामा श्याम सकेल।। (2)

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.5)

श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी सम्पति श्री राधा कृष्ण [दम्पति] की केलि है। यह केलि लीला इतनी रसमयी है कि इसका रस दिन दिन बड़ता है एवं सुख के समुद्र के समान है। [1]

यह केलि अद्वितीय, असीमित, अनुपम एवं अद्भुत रस की खानी है। श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि उनके दृगन में युगल किशोर (श्यामा श्याम एक संग) नित्य ही निवास करते हैं जो क्रीड़ा परायण हैं। [2]