देखै तौ निजु केली कौं  - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (268)

देखै तौ निजु केली कौं - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (268)

देखै तौ निजु केली कौं, और न देखै आन।
जैसे जल में मीन है, तैसे रसिक सुजान॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (268)

चतुर-चूड़ामणि रसिकों की आसक्ति केवल युगल की निज केली में ही रहती है, जैसे मछली की आसक्ति पानी में होती है।