द्वादश चन्द्र, कृतस्थल मंगल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (1)

द्वादश चन्द्र, कृतस्थल मंगल - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (1)

द्वादश चन्द्र, कृतस्थल मंगल, बुद्ध विरुद्ध, सुरु - गुरु बंक।
यद्दि दसम्म भवन्न भृगुसुत, मन्द सुकेतु जनम्म के अंक॥ [1]
अष्टम राहु, चतुर्थ दिवामणि, तौ हरिवंश करत्त न संक।
जो पै कृष्ण-चरण मन अर्पित, तौ करि हैं कहा नवग्रह रंक॥ [2]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (1)

व्याख्याः - श्रीहित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि जन्मकुंडली में चाहे बारहवें चन्द्रमा, चौथे मंगल, विरुद्ध बुद्ध, वृहस्पति वक्री, दशवें शुक्र, केतु और शनि लग्न में हों ।[1]
आठवें राहु और चौथे सूर्य पड़े हों तो भी शंका नहीं करनी चाहिये। क्योंकि जब श्रीकृष्ण के चरणों में मन अर्पित हो चुका तब ये नवग्रह रंक क्या करेंगे? [2]