हम चाकर प्रीतम प्यारी के ।
वृंदाविपिन बिहारी के, अरु श्री - बरसाने वारी के ।। [1]
पास न फटकत महाविष्णु के, अरु उनकी घरवारी के ।
चिन्मय दिव्य धाम वृंदावन, विहरत संग बिहारी के।। [2]
कबहुँक रहत पक्ष प्यारी के, कबहुँ पक्ष बनवारी के।
परत न जाल 'कृपालु' भूलिहूँ, मुक्ति पिशाचिनी नारी के।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (18)
हम केवल गौर - श्याम सरकार के ही दास हैं । वृन्दावन विहारी श्यामसुन्दर एवं बरसाने वाली किशोरी जी ही हमारी सर्वस्व हैं । [1]
हम महाविष्णु एवं उनकी अर्धांगिनी महालक्ष्मी के पास तक नहीं फटकते । दिव्य चिन्मय वृन्दावन धाम में श्यामसुन्दर के साथ हम नित्य विहार करते हैं । [2]
हम कभी तो किशोरी जी के पक्ष में हो जाते है एवं कभी श्यामसुन्दर के पक्ष में हो जाते है । 'कृपालु' कहते हैं कि हम मुक्ति रूपी डाकिनी के जाल से मुक्त हैं । [3]
वृंदाविपिन बिहारी के, अरु श्री - बरसाने वारी के ।। [1]
पास न फटकत महाविष्णु के, अरु उनकी घरवारी के ।
चिन्मय दिव्य धाम वृंदावन, विहरत संग बिहारी के।। [2]
कबहुँक रहत पक्ष प्यारी के, कबहुँ पक्ष बनवारी के।
परत न जाल 'कृपालु' भूलिहूँ, मुक्ति पिशाचिनी नारी के।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (18)
हम केवल गौर - श्याम सरकार के ही दास हैं । वृन्दावन विहारी श्यामसुन्दर एवं बरसाने वाली किशोरी जी ही हमारी सर्वस्व हैं । [1]
हम महाविष्णु एवं उनकी अर्धांगिनी महालक्ष्मी के पास तक नहीं फटकते । दिव्य चिन्मय वृन्दावन धाम में श्यामसुन्दर के साथ हम नित्य विहार करते हैं । [2]
हम कभी तो किशोरी जी के पक्ष में हो जाते है एवं कभी श्यामसुन्दर के पक्ष में हो जाते है । 'कृपालु' कहते हैं कि हम मुक्ति रूपी डाकिनी के जाल से मुक्त हैं । [3]

