वृन्दाटवी विमिलचिद्घन - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.44)

वृन्दाटवी विमिलचिद्घन - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.44)

वृन्दाटवी विमिलचिद्घन-सत्त्ववृन्दा वृन्दारक प्रवरवृन्द-मुनीन्द्र-वन्द्या।
निन्द्यानपि स्वकृपयाऽद्भुतवैभवेन मादृक्पशून् स्वचरणानुचरीकरोतु।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.44)

श्री वृन्दाटवी में जो वास करते हैं, वे समस्त ही निर्मल एवं चिन्मय शरीर को प्राप्त करते हैं, सर्वश्रेष्ठ पूजनीय मुनीन्द्र वृन्द इस धाम की महिमा वर्णन करते हैं। मुझ जैसे निन्दनीय पशुओं को भी श्री वृन्दावन अपनी कृपा एवं अद्भुत विभूति को प्रकाश कर श्री राधा चरणों की दासी करें- यही प्रार्थना है।।44।।