धूरि भरे अति शोभित स्यामजु, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी । [1]
खेलत खात फिरें अंगना, पग पैजनी बाजती पीरी कछोटी॥[2]
वा छवि को 'रसखान' विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।[3]
काग के भाग कहा कहिए, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥[4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
श्यामसुंदर का धूल धूसरित श्यामल शरीर कितना मनोहर लगता है ! उस पर भी उनकी चोटी की छटा और भी अच्छी लग रही है। रसखान कहते हैं कि उनकी इस छवि पर मैं करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को न्योछावर करता हूँ। अहा हा ! कौवे के भाग्य को तो देखो जो उनके हाथ से माखन रोटी छीन कर ले गया।
खेलत खात फिरें अंगना, पग पैजनी बाजती पीरी कछोटी॥[2]
वा छवि को 'रसखान' विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।[3]
काग के भाग कहा कहिए, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥[4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
श्यामसुंदर का धूल धूसरित श्यामल शरीर कितना मनोहर लगता है ! उस पर भी उनकी चोटी की छटा और भी अच्छी लग रही है। रसखान कहते हैं कि उनकी इस छवि पर मैं करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को न्योछावर करता हूँ। अहा हा ! कौवे के भाग्य को तो देखो जो उनके हाथ से माखन रोटी छीन कर ले गया।

