राधे रसिक सिरोमनि रानी।
अदभुत रूप रंग कौ सागर महा प्रेम सुख सानी ॥ (1)
मिलत मिलत में चाह चौगुनी मिलिबे ही की बानी।
श्रीललितकिसोरी प्रीति बढावति अति जाननिमनि मानी ॥ (2)
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (68)
श्री राधे रसिकों की सिरमौर रानी हैं । श्री राधा अदभुत प्रकार के रूप और रस का सागर हैं जो नित्य ही जनों को महा प्रेम सुख प्रदान करने वाली हैं । [1]
इस नित्य विहार रूपी रस में नित्य मिलन है एक क्षण का भी वियोग नहीं, परंतु मिलने की चाह नित्य ही बड़ती जाती है [एवं यही समस्त नित्य विहार के रसिकों की वानी में भी है] । श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि नित्य किशोरी श्री राधा नित्य ही हमारी प्रीति बढ़ाने वाली हैं [वह ऐसी लीला करती हैं जिनसे हमारा प्रेम उनके प्रति बढ़ता रहता है] एवं वह हमारे हृदय की बात भली प्रकार जानने वाली हैं अर्थात् वही हमारी सब कुछ हैं और एक मात्र उन्ही से हमको सारी आशा है । [2]
अदभुत रूप रंग कौ सागर महा प्रेम सुख सानी ॥ (1)
मिलत मिलत में चाह चौगुनी मिलिबे ही की बानी।
श्रीललितकिसोरी प्रीति बढावति अति जाननिमनि मानी ॥ (2)
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (68)
श्री राधे रसिकों की सिरमौर रानी हैं । श्री राधा अदभुत प्रकार के रूप और रस का सागर हैं जो नित्य ही जनों को महा प्रेम सुख प्रदान करने वाली हैं । [1]
इस नित्य विहार रूपी रस में नित्य मिलन है एक क्षण का भी वियोग नहीं, परंतु मिलने की चाह नित्य ही बड़ती जाती है [एवं यही समस्त नित्य विहार के रसिकों की वानी में भी है] । श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि नित्य किशोरी श्री राधा नित्य ही हमारी प्रीति बढ़ाने वाली हैं [वह ऐसी लीला करती हैं जिनसे हमारा प्रेम उनके प्रति बढ़ता रहता है] एवं वह हमारे हृदय की बात भली प्रकार जानने वाली हैं अर्थात् वही हमारी सब कुछ हैं और एक मात्र उन्ही से हमको सारी आशा है । [2]

