प्राण बसी वही माधुरी मूरति - कवि मुरली

प्राण बसी वही माधुरी मूरति - कवि मुरली

(सवैया)
प्राण बसी वही माधुरी मूरति, देखे बिना जिया धीर न आने।
लाज की आन गई कुल कानि सो, कैसे कर जियरा नहिं माने॥ [1]
प्रीति की रीति बुरी 'मुरली', तन जाके लगी सो लगी पहिचाने।
मोहि तो देखें सभी जग साँवरो, साँवरे की गति साँवरे जाने॥ [2]

- कवि मुरली

श्यामसुंदर की मनोहर छवि ने मेरे हृदय को इस प्रकार मोह लिया है कि अब उनके दर्शन बिना एक क्षण भी चैन नहीं पड़ता। ऐसी स्थिति हो गई है कि कुल-लाज और संकोच का बंधन भी टूट गया। [1]

कवि मुरली कहते हैं कि प्रेम करना ही पीड़ाप्रद है। ये बात वही समझ सकता है, जिसको यह प्रेम-रोग लगा हो । अब तो मुझे सारा संसार साँवरा ही दिखाई देता है। उस साँवरे श्यामसुंदर की लीला वही जानें। [2]