एरे मन मेरे तो सों विनती करत ह्वौं रे,
काहे कौं भ्रमंत ब्रजभूमि पंथ गह रे। [1]
लता द्रुम बेलिन में राधा राधा धुन होय,
तहाँ जाय काम क्रोध लोभ मोह दह रे॥ [2]
'लाल बलबीर' जन जुगल उपासी सबै,
उनहीं की पद रज सीस धार लह रे। [3]
और की न आस कीजै वृन्दावन वास सदाँ,
राधे स्याम स्याम-स्याम राधे स्याम कह रे॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (67)
अरे मेरे मन, तुझसे विनती करता हूँ, काहे को तू ब्रज भूमि को छोड़कर बाहर अपने कदम रखता है। [1]
यह ऐसी अद्भुत भूमि है, जिसकी लताओं और वृक्षों से भी "राधा राधा" नाम की धुन ही नित्य प्रकट होती रहती है, जहाँ की वृक्षों के भी संग से स्वतः ही काम, क्रोध, लोभ और मोह का दहन होकर, मन भजन में लगने लगता है। [2]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि इस वृंदावन में सब जन युगल [राधा कृष्ण] के उपासक ही हैं, ऐसे रसिकों की पदरज को शीश पर धारण करना चाहिए। [3]
हे मन, किसी भी अन्य की आशा मत रख, केवल श्री राधा रानी की एक आशा रख, वे जब कृपा करेंगी, तो ही केवल तुझे नित्य वृंदावन का वास मिलेगा। अत: उन श्री राधा महारानी के "राधे श्याम" [युगल मंत्र] का जाप कर । [4]

