क्षण भंगुर जीवन की कलिका, कल प्रात को जाने खिली न खिली।
मलयाचल की शीतल अरु मंद, सुगंध समीर चली न चली॥
- ब्रज के सेवैया
कौन जानता है कि इस नश्वर जीवन की कोमल कली, कल प्रातः खिलेगी या नहीं, और क्या हमें हिमालय समान भक्ति की शीतल, मंद, और सुगंधित वायु का स्पर्श प्राप्त होगा या नहीं।

