विछुरे पिय के जग सूनो भयो - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

विछुरे पिय के जग सूनो भयो - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

(सवैया)
विछुरे पिय के जग सूनो भयो,  अब का करिये कहि पेखिये का। [1]
सुख छांडि के दर्शन को तुम्हरे, इन तुच्छन को अब लेखिये का॥ [2]
‘हरिचन्द’ जो हीरन को ब्यवहार, इन कांचन को लै परेखिये का। [3]
जिन आंखिन में वह रूप बस्यो, उन आंखन सों अब देखिये का॥ [4]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

श्री राधा-कृष्ण के बिना यह संसार सूना और रसविहीन प्रतीत होता है; इन क्षणभंगुर वस्तुओं से उस दिव्य आनंद की प्यास कैसे बुझेगी? [1]

जब उनके दर्शन का अमृतरस मिल चुका है, तब इन तुच्छ सांसारिक वस्तुओं की गणना का क्या प्रयोजन? [2]

श्री हरिचंद जी कहते हैं—जिसे प्रेम रूपी हीरों का व्यापार प्राप्त है, वह काँच जैसे क्षुद्र सांसारिक वैभव को क्यों बटोरे? [3]

जिन नयनों में श्री राधा-कृष्ण का अद्वितीय रूप स्थिर हो चुका है, वे अब और किसी पर दृष्टि क्यों डालें? [4]