नहिं ब्रह्म सों काम कछु हमको - ब्रज के दोहे

नहिं ब्रह्म सों काम कछु हमको - ब्रज के दोहे

नहिं ब्रह्म सों काम कछु हमको, वैकुंठ की राह न जावनी है।
ब्रज की रज में रज ह्वै के मिलूँ, यही प्रीति की रीति निभावनी है॥

- ब्रज के दोहे

हमको ब्रह्म [भगवान] से कोई काम नहीं, न ही हमें वैकुंठ से कुछ लेना देना है, हम वैकुंठ की राह को देखते भी नहीं। हमारी इतनी ही आशा है की ब्रज की रज में हम भी एक कण होकर [रज] बनकर मिल जाएँ, यही प्रीति की रीति हमें निभानी है।