लडैती जू को महल महा सुखरासी ।
जिहि विधि चाहै प्रिया आपु को तैसी केलि विलासी ॥ (1)
छिन छिन प्रीति नई नई बरषत तन मन होत हुलासी।
श्रीललित किसोरी रंग बड़ावती सदा सर्वदा पासी ॥ (2)
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (69)
श्री लाड़ली जी [श्री राधिका जू] का महल अत्यंत सुख प्रदान करने वाला है, जिस भाँति भी वह चाहती हैं उसी प्रकार वह केली विलास करती हैं एवं हम सखियों को रस देती हैं । [1]
प्रत्येक क्षण नया नया रस बरसता है एवं हमारा तन मन रोमांचित हो उठता है । श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि श्री किशोरी जी नित्य ही रंग बढ़ाती हैं, एवं सदा सर्वदा हमारे समीप रहती हैं एवं श्रीजी का वियोग एक क्षण को भी हमें नहीं होता । [2]
जिहि विधि चाहै प्रिया आपु को तैसी केलि विलासी ॥ (1)
छिन छिन प्रीति नई नई बरषत तन मन होत हुलासी।
श्रीललित किसोरी रंग बड़ावती सदा सर्वदा पासी ॥ (2)
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (69)
श्री लाड़ली जी [श्री राधिका जू] का महल अत्यंत सुख प्रदान करने वाला है, जिस भाँति भी वह चाहती हैं उसी प्रकार वह केली विलास करती हैं एवं हम सखियों को रस देती हैं । [1]
प्रत्येक क्षण नया नया रस बरसता है एवं हमारा तन मन रोमांचित हो उठता है । श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि श्री किशोरी जी नित्य ही रंग बढ़ाती हैं, एवं सदा सर्वदा हमारे समीप रहती हैं एवं श्रीजी का वियोग एक क्षण को भी हमें नहीं होता । [2]

