इत्युक्तस्तं परिक्रम्य प्रणम्य च नृपार्भक: ।
ययौ मधुवनं पुण्यं हरेश्चरणचर्चितम् ॥
- श्रीमद भागवतम् (4.8.62)
नारद जी भक्त ध्रुव से कहते हैं: “यह वही मधुवन है, जहां प्रभु श्री कृष्ण ने लीलाएँ कीं, जो लीलाएँ उनकी सम्पन्न हो चुकी हैं, उनका ध्यान करना, यह स्थान श्री कृष्ण चिन्हों से अंकित है एवं पूजनीय है” ।
ययौ मधुवनं पुण्यं हरेश्चरणचर्चितम् ॥
- श्रीमद भागवतम् (4.8.62)
नारद जी भक्त ध्रुव से कहते हैं: “यह वही मधुवन है, जहां प्रभु श्री कृष्ण ने लीलाएँ कीं, जो लीलाएँ उनकी सम्पन्न हो चुकी हैं, उनका ध्यान करना, यह स्थान श्री कृष्ण चिन्हों से अंकित है एवं पूजनीय है” ।

