तेरे भावे कछु करौ, भलो बुरो संसार।
नारायण तू बैठि के, अपनो भवन बुहार॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (32)
संसार में जो कोई जैसा चाहे करे, चाहे भला करे चाहे बुरा; हमें न भले का चिंतन करना है न बुरे का। श्री नारायण स्वामी कहते हैं—‘अरे मन! तू बस अपने हृदय रूपी भवन से विकारों की धूल की सफाई कर और उसे प्रभु के रहने योग्य बना। संसार के प्रपंचों से हटकर आत्म-शुद्धि और भक्ति में लीन रहना ही श्रेष्ठ है।’
नारायण तू बैठि के, अपनो भवन बुहार॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (32)
संसार में जो कोई जैसा चाहे करे, चाहे भला करे चाहे बुरा; हमें न भले का चिंतन करना है न बुरे का। श्री नारायण स्वामी कहते हैं—‘अरे मन! तू बस अपने हृदय रूपी भवन से विकारों की धूल की सफाई कर और उसे प्रभु के रहने योग्य बना। संसार के प्रपंचों से हटकर आत्म-शुद्धि और भक्ति में लीन रहना ही श्रेष्ठ है।’

