सूकर ह्वै कब रास रच्यो अरु बावन ह्वै कब गोपी नचाईं - ब्रज के सवैया

सूकर ह्वै कब रास रच्यो अरु बावन ह्वै कब गोपी नचाईं - ब्रज के सवैया

सूकर ह्वै कब रास रच्यो, अरु बावन ह्वै कब गोपी नचाईं। [1]
मीन ह्वै कोन के चीर हरे, कछुआ बनि के कब बीन बजाई॥ [2]
ह्वै नरसिंह कहो हरि जू तुम, कोन की छतियन रेख लगाई। [3]
वृषभानु लली प्रगटी जबते, तबते तुम केलि कलानिधि पाई॥ [4]

- ब्रज के सवैया

हे हरि! जब आप वराह (सूकर) अवतार में थे, तब आपने रासलीला कब रची? और जब आप वामन बने, तब गोपियों को कब नचाया? [1]

जब आप मत्स्य (मछली) अवतार में थे, तब किसके वस्त्र आपने हर लिए? और जब आप कच्छप (कछुए) बने, तब किसके लिए आपने बाँसुरी बजाई? [2]

जब आप नरसिंह बने, तब किसके वक्षस्थल पर आपने प्रेम की रेखा अंकित की? [3]

जब से वृषभानुनंदिनी (श्री राधा) प्रकट हुई हैं, तभी से आपने यह प्रेम-लीला और केली कला की पराकाष्ठा प्राप्त की अर्थात् तब से ही आपकी महिमा बढ़ गई है। [4]