माई री श्याम श्याम रटत श्यामाँ आपहि श्याम भई - श्री हित रामराय जी

माई री श्याम श्याम रटत श्यामाँ आपहि श्याम भई - श्री हित रामराय जी

(राग गौरी एवं राग जैजैवंती एवं राग पीलू)
माई री श्याम श्याम रटत श्यामाँ आपहि श्याम भई।
अपनी सखीन सो यो पूछत है श्यामाँ कहाँ गई।। [1]
व्रजवीथिन में ढूँढ़त डोलत बोलत राधे राधे।
रही विचार निहार सोचकर सखी सकल मौन साधे।। [2]
प्रेम लगन जाके लागत है ताहि कहों सुधि कैसी।
कहैं भगवान हित रामराय प्रभु लगन लगे जब ऐसी।। [3]

-श्री हित रामराय जी

अरी सखी, श्याम श्याम रटते रटते श्यामा जू [श्री राधा] स्वयं श्याम बन गयी एवं सखियों से पूछने लगी की श्यामा [राधा] कहाँ हैं? [1]
फिर श्र्री राधे वन में जाती हैं और स्वयं को ही खोजते हुए "राधे राधे" बोलती हैं, जब सखियों ने उनके इस व्यवहार को देखा तो वे स्तब्ध रह गई और मौन हो गयी। [2]
श्री हित रामराय जी कहते हैं कि जिसे भी ऐसी प्रेम लगन लग जाती है उसे अपनी सुधि कैसे रह सकती है ? [3]