तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम् ।
यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द-स्त्वद्यापि यत्पदरज: श्रुतिमृग्यमेव ॥
- श्रीमद भागवतम् (10.14.34)
श्री ब्रह्मा जी कहते हैं कि ब्रज के किसी भी निवासी की चरण रज मिल जाए एवं ब्रज में किसी भी देह में जन्म मिल जाए, परंतु मेरे मस्तक पर नित्य ही ब्रज गोकुल के निवासियों की चरण रज रहे । यहाँ के जीवों का का तो कण श्री कृष्ण के लिए समर्पित है, जिनकी चरण रज श्रुतियाँ आज तक ढूँढ रही हैं ।
यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द-स्त्वद्यापि यत्पदरज: श्रुतिमृग्यमेव ॥
- श्रीमद भागवतम् (10.14.34)
श्री ब्रह्मा जी कहते हैं कि ब्रज के किसी भी निवासी की चरण रज मिल जाए एवं ब्रज में किसी भी देह में जन्म मिल जाए, परंतु मेरे मस्तक पर नित्य ही ब्रज गोकुल के निवासियों की चरण रज रहे । यहाँ के जीवों का का तो कण श्री कृष्ण के लिए समर्पित है, जिनकी चरण रज श्रुतियाँ आज तक ढूँढ रही हैं ।

