(राग केदारौ)
पिय सौं तू जोई जोई करै सोई छाजै |
और सेंघ करै जो तेरी सोई लाजै || [1]
तू सुर ज्ञान सब अंग सखी री मान करत बेकाजै |
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम जिय में बसै
तू नित नित बिराजै || [2]
- श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (43)
श्री हरिदासी सखी कहती हैं हे प्यारी जू [राधे] आप जो जो भी करती हैं प्रियतम [श्री बिहारीजी] को वो सब सब प्रिय लगता है। हे प्यारी, आपकी कौन समानता कर सकता है, जिसने भी आपसे अपने आप की समानता करने की कोशिश की वह सब लज्जा को प्राप्त हुए हैं। [1]
आप प्रत्येक अंग से ज्ञानी एवं धनी हैं, आपका मान करना व्यर्थ है । श्री ललिता सखी [हरिदास जी] कहती हैं कि आप श्याम सुंदर के हृदय में नित्य ही विराजती हैं। [2]
पिय सौं तू जोई जोई करै सोई छाजै |
और सेंघ करै जो तेरी सोई लाजै || [1]
तू सुर ज्ञान सब अंग सखी री मान करत बेकाजै |
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम जिय में बसै
तू नित नित बिराजै || [2]
- श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (43)
श्री हरिदासी सखी कहती हैं हे प्यारी जू [राधे] आप जो जो भी करती हैं प्रियतम [श्री बिहारीजी] को वो सब सब प्रिय लगता है। हे प्यारी, आपकी कौन समानता कर सकता है, जिसने भी आपसे अपने आप की समानता करने की कोशिश की वह सब लज्जा को प्राप्त हुए हैं। [1]
आप प्रत्येक अंग से ज्ञानी एवं धनी हैं, आपका मान करना व्यर्थ है । श्री ललिता सखी [हरिदास जी] कहती हैं कि आप श्याम सुंदर के हृदय में नित्य ही विराजती हैं। [2]

