परा भक्ति याको कहैं, जित तित श्याम दिखात।
नारायण सो ज्ञान है, पूरण ब्रह्म लखात॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (180)
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि 'परा भक्ति' उसे कहते हैं जिसमें भक्त को जहाँ-तहाँ, सर्वत्र केवल अपने प्रियतम श्यामसुंदर के ही दर्शन होते हैं। यही वह वास्तविक ज्ञान है, जिसके उदय होते ही कण-कण में उस पूर्ण ब्रह्म (परमात्मा) का साक्षात्कार होने लगता है।
नारायण सो ज्ञान है, पूरण ब्रह्म लखात॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (180)
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि 'परा भक्ति' उसे कहते हैं जिसमें भक्त को जहाँ-तहाँ, सर्वत्र केवल अपने प्रियतम श्यामसुंदर के ही दर्शन होते हैं। यही वह वास्तविक ज्ञान है, जिसके उदय होते ही कण-कण में उस पूर्ण ब्रह्म (परमात्मा) का साक्षात्कार होने लगता है।

