वृन्दावन चाहे दास दास ह्वै किसोरी जू कौ - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (73)

वृन्दावन चाहे दास दास ह्वै किसोरी जू कौ - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (73)

वृन्दावन चाहे दास दास ह्वै किसोरी जू कौ ,
ढूंकै जिन दूजी ओर चित ना डुलावैगो। [1]
मनिक महल में विराजें प्रिया प्रीतम जू ,
तिनकौ सदैव हित ही सों गुन गावैगो॥ [2]
'लाल बलबीर' लैगौ रसिकन संग रंग,
होयगौ अभंग तन ताप कौ नसावैगो। [3]
प्रानन समान बनराज कौं गिनैगो तबै ,
जबै रस रीति प्रीति ही की रीति पावैगो॥ [4]    
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (73)

मैं केवल श्री किशोरीजी (राधा) का दास हूँ, मैं वृंदावन के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, और मैं अपने चित्त को वृंदावन और किशोरीजी से दूर कभी नहीं डुलाऊँगा। [1]

श्री राधा कृष्ण नित्य ही वृंदावन में विराजते हैं, मैं नित्य ही केवल प्रिया प्रियतम के ही गुण गाऊँगा। [2]

श्री लाल बलबीर कहते हैं कि मैं नित्य ही कामना करता हूँ कि रसिक संतों की संगति में रहूँ, जिसके प्रभाव से मेरे तापों का नाश होगा और प्रिया प्रियतम में नित्य ही प्रेम बढ़ेगा। [3]

मैं रसिकों द्वारा अपनाई गई प्रीति की रीति और रस उपासना को हृदय से अपनाऊँगा और मैं भी वृंदावन धाम को प्राणों से अधिक प्रेम करूँगा (जैसा रसिक करते हैं)। [4]