अब तो करिये कृपा विहारी।
जग भुंजारन तैं लै राखो वे जहाँ कुंज तिहारी।। [1]
सजन समाज सहित तिहिं ठां रस-भक्ति करों सुखकारी।
नागरीदास नांव दैं कैं किन देखो दशा हमारी ॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (95)
हे बिहारी जी, अब तो आप हमपर कृपा कीजिए। जग जंजाल से हमें निकल कर आप हमें वहाँ बसाइए जहां आपकी कुंज (वृंदावन) है। [1]
वृंदावन धाम में हम जब बसेंगे तब हमें आपके निज रसिक भक्तों का संग प्राप्त होगा और हम नित्य ही आपकी रस भक्ति करेंगे।श्री नागरीदास जी अत्यंत दैन्य भाव से कहते हैं कि हे प्यारे मेरा नाम तो नागरी दास (राधा रानी का दास) है, परंतु तनिक मेरी दशा भी देखो (एवं सुधारो)। [2]
वृंदावन धाम में हम जब बसेंगे तब हमें आपके निज रसिक भक्तों का संग प्राप्त होगा और हम नित्य ही आपकी रस भक्ति करेंगे।श्री नागरीदास जी अत्यंत दैन्य भाव से कहते हैं कि हे प्यारे मेरा नाम तो नागरी दास (राधा रानी का दास) है, परंतु तनिक मेरी दशा भी देखो (एवं सुधारो)। [2]

