मन मोहन मन मोहनी - श्री हित ध्रुवदास,  पद्यावली (46)

मन मोहन मन मोहनी - श्री हित ध्रुवदास, पद्यावली (46)

(राग विहागरौ)
मन मोहन मन मोहनी ।
चितवनि मुसिकनि सहज रँगीली, अतिहि छबीली सोहनी ।। [1]
कहा कहौं रँग प्रेम की सींवा, पिय तन प्यार की जोहनी ।
'हित ध्रुव’ मनहुँ सुधा-रस ढारति, आनंद सौं पति-रोहनी ।। [2] 
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (46)

श्री लाडिली प्रिया मन-मोहन प्रियतम के भी मन को मोहित करने वाली महामोहिनी है। उनकी चितवन एवं मुस्कान स्वाभाविक ही रंग रंगीली है। वे आत्यंतिक रूप से छविमयी अवं शोभना है। [1]
मैं उनका क्या वर्णन करुँ ? वे आनंद अवं प्रेम की परावधि है, जो सदा प्रियतम की ओर प्रेम-दृष्टि से निहारती रहती है । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि उनकी प्रेम -दृष्टि को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो चन्द्रमा आनंदपूर्वक अमृत रस प्रवाहित कर रहा हो। [2]