चतुरानन देख्यौ कछुक - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (45)

चतुरानन देख्यौ कछुक - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (45)

चतुरानन देख्यौ कछुक, वृंदाविपिन प्रभाव। 
द्रुम-द्रुम प्रति अरु लता प्रति, औरे बन्यौ बनाव॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (45)

ब्रह्मा जी ने किंचित श्री वृंदावन के अद्भुत प्रभाव का अनुभव किया और पाया कि यहाँ के तरु-लताओं की रचना किसी और प्रकार की नहीं, बल्कि अद्वितीय है।