राधामोहन सहज सनेही - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी,  उत्तरार्ध (5)

राधामोहन सहज सनेही - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (5)

(राग गौरी)
राधामोहन सहज सनेही ।
सहज रूप गुन सहज लाड़िले, एक प्राण द्वै देही ।। [1]
सहज माधुरी अंग अंग प्रति, सहज रची (है) वन गेही ।
व्यास सहज जोरी सौं मन मेरे, सहज प्रीति कर लेही ।। [2]

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (5)

राधा मोहन सहज ही स्नेही हैं । उनके रूप एवं गुण भी सहज हैं और श्री राधा मोहन एक प्राण हैं परंतु दो देह धारण किए हैं। [1]
श्री राधा कृष्ण की अंग अंग की माधुरी भी सहज है, एवं अपना निज गेह [घर] श्री वृंदावन धाम भी सहज ही रचा है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि अरे मेरे मन ऐसी अद्भुत सहज जोरी से तू सहज ही  प्रीति [प्रेम] कर ले। [2]