प्रेम रूप रस खानी, ऐसी राधेरानी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (40)

प्रेम रूप रस खानी, ऐसी राधेरानी - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (40)

प्रेम रूप रस खानी, ऐसी राधेरानी। [1]
वृंदावन महारानी, ऐसी राधेरानी। [2]
शिव बने हैं शिवानी, ऐसी राधेरानी। [3]
हरि हूँ की ठकुरानी, ऐसी राधेरानी। [4]
पाछे डोले चक्रपाणी, ऐसी राधेरानी। [5]
ब्रह्म करे अगवानी, ऐसी राधेरानी। [6]
बड़ी अवढर दानी, ऐसी राधेरानी। [7]
कोटि रमा नौकरानी, ऐसी राधेरानी। [8]
करे नित मनमानी, ऐसी राधेरानी। [9]
दिव्य ब्रज रस खानी, ऐसी राधा रानी।  [10]
हौं 'कृपालु' भी दीवानी, ऐसी राधा रानी।। [11]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (40)

हमारी राधारानी प्रेम, रूप तथा रस की खान हैं। (1)

हमारी राधारानी श्रीधाम वृन्दावन की महारानी हैं। (2)

हमारी राधारानी  की कृपा से ही भगवान शंकर शिवानी गोपी बने हैं। (3)

हमारी राधारानी श्री कृष्ण की भी ठकुरानी हैं। (4)

चक्रपाणी श्रीहरि हमारी राधारानी के पीछे डोलते हैं। (5)

हमारी राधारानी की अगवानी ब्रम्ह करते हैं। (6)

हमारी राधारानी तत्काल प्रेम दान करनेवाली है। (7)

करोड़ों लक्ष्मी हमारी राधारानी के सेवा मे उपस्थित हैं। (8)

हमारी राधारानी नित्य ही मनमानी करती है, बिना किसी के दोष देखे कृपा करती हैं। (9)

हमारी राधारानी दिव्य ब्रज रस की खान हैं। (10)

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "मैं भी श्री राधारानी की दीवानी हूँ"। (11)