कृष्ण चरित्र त्रिधा त्रिभुवन में - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी

कृष्ण चरित्र त्रिधा त्रिभुवन में - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी

कृष्ण चरित्र त्रिधा त्रिभुवन में, बहु भक्ति भेद विस्तार ।
जहाँ जु रस तहाँ तिहिं वैस, सुख देति सबनि उदार ।। [1]
गाय, ग्वाल, गोप, गोपीजन न्यारौ ब्रज व्यौहार।
सबते दूर दुर्जन दुर्यौ क्यों सुलभ होत सुकुमार ।। [2]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी

श्री बिहारी दास जी कहते है कि कृष्ण चरित्र को ही लें। ब्रज लीला, मथुरा लीला, एवं द्वारका लीला के आधार पर तीन प्रकार का है। उनकी भक्ति का रस भी अलग अलग है । वे कहते है भगवान तो बडे उदार है, सबको जैसा वे चाहते है उनको वैसा ही सुख प्रदान करते हैं। [1]
परंतु स्वामी हरिदास जी की इस रस रीति से ब्रज के गौ, ग्वाल, गोप, गोपीजन आदि का व्यवहार बिलकुल पृथक है क्यूँकि इसमें तो गोपियों का भी प्रवेश नहीं है । स्वामी हरिदासजी का उपस्य रस तो सबसे दूर है, दुर्लभ है, सुकुमार है एवं नित्य केली परायण है । वह सबको सुलभ नहीं हो सकता। [2]