जिनके मुहडे सों कड़े - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, युगल विहार शतक (17)

जिनके मुहडे सों कड़े - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, युगल विहार शतक (17)

जिनके मुहडे सों कड़े, जुगुल विहार की बात।
तिनके अर्पण कीजिए, श्रवण नयन दिनरात॥

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, युगल विहार शतक (17)
 
जिन रसिक जनों के मुख से केवल युगल-विहार की ही रसीली बातें निकलती हैं, उन्हीं को अपने श्रवण और नयन दिन-रात अर्पित कीजिए—अन्य किसी को नहीं।