वसुधा के सुधा जग की सुखमा - श्री छबीले जी

वसुधा के सुधा जग की सुखमा - श्री छबीले जी

(सवैया)
वसुधा के सुधा जग की सुखमा, मुनि मानस मंजु राधिका के।
सुख कन्द सदाँ दुख द्वन्द दरें, सुर सिद्धन सिद्धि समाधिका के॥ [1]
छवि छैल ‘छबीले’ रँगीले लसै, ब्रजवासिन कारज साधिका के।
नन्दनन्दन वन्दत आनन्दसों, पद पंकज वन्दत राधिका के॥ [2]

- श्री छबीले जी

श्रीराधिका वसुधा (पृथ्वी) की सुधा (अमृत) हैं और जगत की परम सुखमयी शोभा हैं; वे मुनियों के मन की मंजुल अभिलाषा हैं।
जो सदा सुख की मूल हैं और दुख-द्वंद्व को नष्ट कर देती हैं; वे ही देवताओं और सिद्धों के लिए सिद्धि और समाधि का कारण हैं। [1]

उनकी छवि अनुपम, छैल-छबीली और रंगीली शोभा से लस रही है; वे ब्रजवासियों के सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली हैं।
नन्दनन्दन श्रीकृष्ण आनंदपूर्वक उनके पद-पंकजों का वंदन करते हैं, ऐसी हमारी श्री राधिका महारानी हैं। [2]