जामैं मरैं न बीछुरैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (377)

जामैं मरैं न बीछुरैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (377)

जामैं मरैं न बीछुरैं, रूठै नंहि कहूँ जाइ।
श्रीबिहारीदास भयौ लाडिलौ, ता लाडिलीहीं लडाइ॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (377)

श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि सर्वोपरि नित्य-विहारिणी हमारी श्री स्वामिनीजू न तो कभी प्रकट होती हैं, न कभी अन्तर्धान होती हैं, न कभी रूठती हैं और न ही एकान्त रस-विलास महल श्रीवृन्दावन से कभी बाहर जाती हैं। ऐसी अति अद्भुत महानुरागमयी लाड़िली जू के मन को जो-जो भाता है, उसी प्रकार उन्हें लाड़ लड़ाकर हम उनके निरंतर लाड़ले बने रहते हैं।