(राग विलावल )
राजति कुँवरि परम सुकुवाँरी ।
भोर कुंज ते निकसि खरी भई, रुचिर बाहु पिय अंसनि डारि ।। [1]
कबरी सिथिल सकल अँग भूषण, लटकि रही प्रियतम उर लागि ।
सुरत सरस रँग-भरी लाडिली , आरस में राखी मनौ पागि ।। [2]
मुद्रित होत नेंन छिन ही छिन, रैंन जगी तातें अधिक जँभाति ।
'हित ध्रुव' यह सुख निरखि मुदित मन सहचरि, दै चुटकी बलि जाति ।। [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (7)
आज परम सुकुमारी श्री किशोरी अपूर्व शोभा को प्राप्त हैं । वे प्रातः काल ही कुञ्ज भवन से निकल कर अपनी ललित बाहु-लताओं को प्रियतम के स्कन्धों पर डाले हुए प्रसन्न-मन खड़ी है ।।1।।
उनकी केश कबरी(जूड़ा) अवं अंगो के समस्त आभूषण शिथिल है तथा वे आलस्यः से भरी हुई प्रियतम के हृदय से लिपट रही है । उनकी इस छवि का अवलोकन करके ऐसा लगता है, मानो प्रेम के सरस केलि-रंग से भरी हुई लाडिली-प्रिया आज आलस्य से पग गयी है ।।2।।
रात्रि-जागरण के कारण प्रिया के नेत्र क्षण-क्षण में बारम्बार मुंद-मुंद जाते है एवं वे अधिकाधिक जम्भाई लेती है । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि इस सुख का अवलोकन करके सखियों का मन प्रसन्न हो उठता है और वे चुटकी दे-दे कर बलिहार जाती है ।।3।।
राजति कुँवरि परम सुकुवाँरी ।
भोर कुंज ते निकसि खरी भई, रुचिर बाहु पिय अंसनि डारि ।। [1]
कबरी सिथिल सकल अँग भूषण, लटकि रही प्रियतम उर लागि ।
सुरत सरस रँग-भरी लाडिली , आरस में राखी मनौ पागि ।। [2]
मुद्रित होत नेंन छिन ही छिन, रैंन जगी तातें अधिक जँभाति ।
'हित ध्रुव' यह सुख निरखि मुदित मन सहचरि, दै चुटकी बलि जाति ।। [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (7)
आज परम सुकुमारी श्री किशोरी अपूर्व शोभा को प्राप्त हैं । वे प्रातः काल ही कुञ्ज भवन से निकल कर अपनी ललित बाहु-लताओं को प्रियतम के स्कन्धों पर डाले हुए प्रसन्न-मन खड़ी है ।।1।।
उनकी केश कबरी(जूड़ा) अवं अंगो के समस्त आभूषण शिथिल है तथा वे आलस्यः से भरी हुई प्रियतम के हृदय से लिपट रही है । उनकी इस छवि का अवलोकन करके ऐसा लगता है, मानो प्रेम के सरस केलि-रंग से भरी हुई लाडिली-प्रिया आज आलस्य से पग गयी है ।।2।।
रात्रि-जागरण के कारण प्रिया के नेत्र क्षण-क्षण में बारम्बार मुंद-मुंद जाते है एवं वे अधिकाधिक जम्भाई लेती है । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि इस सुख का अवलोकन करके सखियों का मन प्रसन्न हो उठता है और वे चुटकी दे-दे कर बलिहार जाती है ।।3।।

