लोकाः स्वच्छन्दनिन्दां विंदधति यदि मे किं ततो दीनदीनं
सर्वं चेत् स्यात् कुटुम्बं किमिव मम ततो दुर्दशाः स्युस्ततः किम्?
सेवाधीशस्य न स्याद् यदि किमिव ततः श्रीलवृन्दावनेऽहं
स्थास्याम्यास्थाय धैर्यं मम निजपरमाभीष्टसिद्धिर्भवित्री।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.63)
यदि सब लोक मेरी यथेष्ट निन्दा करें, उससे मेरी हानि क्या? यदि मेरा सब कुटुम्ब दीनातिदीन (अत्यन्त दरिद्री) हो जाये तो उससे मेरा क्या बिगाड़? मेरी अत्यन्त दुर्दशा हो तो क्या? और यदि भगवान की सेवा मुझसे न बन पड़े, तो मेरी हानि क्या? किन्तु मैं श्री वृन्दावन में धैर्य पूर्वक वास करूंगा- अवश्य ही मुझे अपनी परम- अभीष्ट वस्तु प्राप्त होगी।।
सर्वं चेत् स्यात् कुटुम्बं किमिव मम ततो दुर्दशाः स्युस्ततः किम्?
सेवाधीशस्य न स्याद् यदि किमिव ततः श्रीलवृन्दावनेऽहं
स्थास्याम्यास्थाय धैर्यं मम निजपरमाभीष्टसिद्धिर्भवित्री।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.63)
यदि सब लोक मेरी यथेष्ट निन्दा करें, उससे मेरी हानि क्या? यदि मेरा सब कुटुम्ब दीनातिदीन (अत्यन्त दरिद्री) हो जाये तो उससे मेरा क्या बिगाड़? मेरी अत्यन्त दुर्दशा हो तो क्या? और यदि भगवान की सेवा मुझसे न बन पड़े, तो मेरी हानि क्या? किन्तु मैं श्री वृन्दावन में धैर्य पूर्वक वास करूंगा- अवश्य ही मुझे अपनी परम- अभीष्ट वस्तु प्राप्त होगी।।

