(सवैया)
राधिका कृष्ण कौ नैंन लखों सखी, राधिका कृष्ण के गुण गाऊँ। [1]
राधिका कृष्ण रटौ रसना नित, राधिका कृष्ण को उर ध्याऊँ॥ [2]
राधिका कृष्ण की मोहनी मूरत, ताकी सदा शुचि झूठन पाऊँ। [3]
'सरस' कहैं करौ सेवा निरंतर, कुंज को त्याग कै अनत न जाऊँ॥ [4]
- श्री सरस माधुरी
सखी! श्री राधा-कृष्ण के मनोहर नेत्रों का दर्शन करो और प्रेम से उनके गुणों का गान करो। [1]
अपनी जिह्वा को उनके नाम में रमा दो और हृदय में निरंतर उनका ध्यान करो। [2]
उनकी मोहक मूर्ति को निहारते रहो और प्रेमपूर्वक उनके उच्छिष्ट का सेवन करो। [3]
सरस माधुरी कहते हैं—निरंतर सेवा में लीन रहो और वृन्दावन के पावन कुंजों को कभी न छोड़ो। [4]
राधिका कृष्ण कौ नैंन लखों सखी, राधिका कृष्ण के गुण गाऊँ। [1]
राधिका कृष्ण रटौ रसना नित, राधिका कृष्ण को उर ध्याऊँ॥ [2]
राधिका कृष्ण की मोहनी मूरत, ताकी सदा शुचि झूठन पाऊँ। [3]
'सरस' कहैं करौ सेवा निरंतर, कुंज को त्याग कै अनत न जाऊँ॥ [4]
- श्री सरस माधुरी
सखी! श्री राधा-कृष्ण के मनोहर नेत्रों का दर्शन करो और प्रेम से उनके गुणों का गान करो। [1]
अपनी जिह्वा को उनके नाम में रमा दो और हृदय में निरंतर उनका ध्यान करो। [2]
उनकी मोहक मूर्ति को निहारते रहो और प्रेमपूर्वक उनके उच्छिष्ट का सेवन करो। [3]
सरस माधुरी कहते हैं—निरंतर सेवा में लीन रहो और वृन्दावन के पावन कुंजों को कभी न छोड़ो। [4]

