(कवित्त)
बनो दाव तेरो बैन मान ले तू मेरौ ,
सुख पाय है घनेरौ नेह कीजै रसिकन में। [1]
रज अंग धारौ स्यामा स्याम कौ उचारौ ,
जग सीस छार डारौ सदा बिचरौ लतन में॥ [2]
'लाल बलबीर' हारौ माया मद मोह द्रोह,
पोह मन अब तौ किसोरी के चरन में। [3]
और फरफन्द जेते छोड़ दे जगत के ते ,
सदॉ ही मगन ह्वे कै बस वृन्दावन में॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (66)
अरे मन, मेरी बात मान ले, तेरा बहुत उत्तम बनाव बन चुका है। अब तू केवल रसिकों से ही नेह कर, उसी के परिणाम स्वरूप ही तुझे अनंत सुख मिलेगा। [1]
बनो दाव तेरो बैन मान ले तू मेरौ ,
सुख पाय है घनेरौ नेह कीजै रसिकन में। [1]
रज अंग धारौ स्यामा स्याम कौ उचारौ ,
जग सीस छार डारौ सदा बिचरौ लतन में॥ [2]
'लाल बलबीर' हारौ माया मद मोह द्रोह,
पोह मन अब तौ किसोरी के चरन में। [3]
और फरफन्द जेते छोड़ दे जगत के ते ,
सदॉ ही मगन ह्वे कै बस वृन्दावन में॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (66)
अरे मन, मेरी बात मान ले, तेरा बहुत उत्तम बनाव बन चुका है। अब तू केवल रसिकों से ही नेह कर, उसी के परिणाम स्वरूप ही तुझे अनंत सुख मिलेगा। [1]
अपने अंग-अंग में वृंदावन धाम की रज लगा, और श्यामा श्याम को ही नित्य पुकार, जगत को हृदय से त्याग कर सदा इन वृंदावन की लताओं में विचरण कर। [2]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि अनंत काल से काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, द्रोह इत्यादि में ही तू फँसा रहा, अब इन सबको त्याग कर श्री किशोरी जी [राधारानी] के चरणों में मन को नित्य लगा [शरणागत हो जा]। [3]
अनंत कोटि माया के फंदों को त्याग कर नित्य ही प्रेम में मगन होकर श्री वृंदावन वास कर और हर क्षण इस वृंदावन रस में डूबा रह। [4]

