दीनदयाल सुने जब ते - श्री मलूक जी

दीनदयाल सुने जब ते - श्री मलूक जी

(सवैया)
दीनदयाल सुने जब ते, तब ते मन में कछु ऐसी बसी है। [1]
तेरो कहाय कैं जाऊं कहाँ, अब तेरे नाम की फेंट कसी है॥ [2]
तेरो ही आसरौ एक 'मलूक', नहीं प्रभु सौ कोऊ दूजौ जसी है। [3]
एहो मुरारि पुकारि कहूं, अब मेरी हंसी नाँहि तेरी हँसी है॥ [4]

- श्री मलूक जी

हे प्रभु! जब से मैंने आपका दीनदयाल नाम सुना, तभी से मैं आपका हो गया। [1]

अब जब मैं आपका हो गया हूँ, तो आपके नाम का ही गुणगान कर रहा हूँ। [2]

श्री मलूकदास जी कहते हैं—“मुझे तो केवल श्री मुरारी का ही आसरा है; श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई मुझे भाता ही नहीं।” [3]

हे मुरारी! मैं करुण क्रंदन करते हुए बस इतना कहता हूँ—यदि आपने मुझे न सँवारा, तो लोग अब मुझ पर नहीं, आप पर हँसेंगे । [4]