आप सहित सब चतुर्भुज, सब ठाँ रह्यौ निहारि।
प्रभुता अपनी भूलि गयौ, तन मन के रह्यौ हारि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (46)
ब्रह्मा जी ने जब स्वयं सहित चारों ओर श्री वृन्दावन को निहारा, तो सबको ही चतुर्भुज रूप में पाया। यहाँ का वैभव देखकर वे अपनी प्रभुता सर्वथा भूल गए और उनकी गति तथा मति भी थकित हो गई।
प्रभुता अपनी भूलि गयौ, तन मन के रह्यौ हारि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (46)
ब्रह्मा जी ने जब स्वयं सहित चारों ओर श्री वृन्दावन को निहारा, तो सबको ही चतुर्भुज रूप में पाया। यहाँ का वैभव देखकर वे अपनी प्रभुता सर्वथा भूल गए और उनकी गति तथा मति भी थकित हो गई।

