सुन्दर मूरति दृष्टि परी - ब्रज के सवैया

सुन्दर मूरति दृष्टि परी - ब्रज के सवैया

सुन्दर मूरति दृष्टि परी, तब ते जिय चंचल होय रहा है। [1]
सोच सकोच सभी जो मिटे, अरु बोल कुबोल सभी जो सहा है॥ [2]
रैन दिना मोहि चैन न आवति, नैनन सों जल जात बहा है। [3]
तापै कहैं सखि लाज करौ, अब लागि गई तब लाज कहा है॥ [4]
- ब्रज के सवैया 

जब से उस मनोहर मूर्ति (श्रीकृष्ण) के दर्शन हुए हैं, तब से मेरा मन अत्यंत चंचल और व्याकुल हो गया है। [1]

अब न अपनी कोई सोच बची है, न संकोच की कोई रेखा। सारे बुरे-भले विचार मन से लुप्त हो चुके हैं। [2]

रात-दिन चैन नहीं है, नेत्रों से अश्रुधारा अविरल बह रही है। [3]

सखी कहती है—“कुछ तो लज्जा करो।” मैं कहती हूँ—“जब प्रियतम के प्रति मन समर्पित हो गया, तब लाज की कोई जगह कहाँ रही?” [4]