आली जुगुलविहार रस, जिनके सदा आहार।
तिनकी दासी ह्वै रहो, तजिके सोच विचार॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, युगल विहार शतक (14)
हे सखि! जिन रसिक जनों का आहार केवल युगल-रस ही है, उन रसिकों का दासत्व बिना किसी सोच-विचार के स्वीकार कर लो।
तिनकी दासी ह्वै रहो, तजिके सोच विचार॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, युगल विहार शतक (14)
हे सखि! जिन रसिक जनों का आहार केवल युगल-रस ही है, उन रसिकों का दासत्व बिना किसी सोच-विचार के स्वीकार कर लो।

