नारायण यह प्रेम सुख, मुखसों कह्यो न जाय।
ज्यों गूंगौ गुड़ खात है, सैनन स्वाद लखाय॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (150)
यह प्रेम-सुख अत्यंत अद्भुत है। इसका वाणी से वर्णन करना उतना ही असम्भव है, जितना कि कोई गूंगा यदि गुड़ खाए तो उसके स्वाद का वर्णन नहीं कर सकता।
ज्यों गूंगौ गुड़ खात है, सैनन स्वाद लखाय॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (150)
यह प्रेम-सुख अत्यंत अद्भुत है। इसका वाणी से वर्णन करना उतना ही असम्भव है, जितना कि कोई गूंगा यदि गुड़ खाए तो उसके स्वाद का वर्णन नहीं कर सकता।

