हमारी निधि, श्री वृषभानु दुलार  - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज,दैन्य माधुरी (93)

हमारी निधि, श्री वृषभानु दुलार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज,दैन्य माधुरी (93)

हमारी निधि, श्री वृषभानु दुलार । [1]
जाकी भृकुटि विलास विलोकत, नागर नंदकुमार ।। [2]
ब्रज वीथिन बिच भयो बावरो, राधे राधे पुकार । [3]
विकल नैन दिन – रैन दरस बिन, छिन छिन पंथ निहार ।। [4]
भाग मनावत आपुन कबहुँक, लखौं चरन इक बार । [5]
निज आराध्य ब्रह्म – दुर्गति लखि, लाजत ज्ञानि गमार ।। [6]
मम ‘कृपालु’ आंधे की लाकरि, राधे नाम अधार ।[7]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (93)

हमारी निधि तो एकमात्र वृषभानुनन्दिनी श्री राधिका जी हैं। [1]
जिनकी भृकुटि – विलास को ब्रह्म श्रीकृष्ण भी नित्य देखते रहते हैं ( जिनकी भौहों के इशारे पर ब्रह्म भी दास बनकर चलता रहता है।) [2]
ब्रज की गलियों – गलियों में दीवाना होकर वही ब्रह्म ‘राधे, राधे’ की पुकार किया करता है। [3]
एवं जिन राधिका जी के दर्शन के लिए दिन – रात व्याकुल होकर विरही बना हुआ मग जोहता रहता है। [4]
जिन राधिका जी के एक बार भी चरण – कमलों के दर्शन के लिए अपना भूरि भाग्य मनाया करता है। [5]
वही वृषभानुनन्दिनी राधा हमारी सर्वस्व हैं। ज्ञानीजन अपने आराध्य ‘ब्रह्म’ की उपर्युक्त दुर्दशाओं को देखकर अज्ञानतावश लज्जित होते हैं। [6]
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मुझ अन्धे के लिए तो राधे नाम रूपी लठिया का ही एकमात्र सहारा है। [7]