या अनुरागी चित्त की, गति नहिं जाने कोय।
ज्यौं ज्यौं बूढ़ै श्याम रंग, त्यौं त्यौं उज्ज्वल होय॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई
जिस हृदय में श्यामसुंदर के अनुराग-रस का प्रादुर्भाव होता है, उस हृदय की गति को कोई नहीं समझ सकता। जितना-जितना श्याम-रंग गहरा होता जाता है, उतना-उतना ही वह जीव उज्ज्वल होता जाता है।
ज्यौं ज्यौं बूढ़ै श्याम रंग, त्यौं त्यौं उज्ज्वल होय॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई
जिस हृदय में श्यामसुंदर के अनुराग-रस का प्रादुर्भाव होता है, उस हृदय की गति को कोई नहीं समझ सकता। जितना-जितना श्याम-रंग गहरा होता जाता है, उतना-उतना ही वह जीव उज्ज्वल होता जाता है।

