राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ - श्री सूरदास, सूर सागर, राधा-कृष्ण (30)

राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ - श्री सूरदास, सूर सागर, राधा-कृष्ण (30)

(राग धनाश्री)
राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ।
जब तू इत-उत बंक बिलोकति, होत निसा-पति फीकौ।। [1]
भृकुटी धनुष, नैन सर, साँधे, सिर केसरि कौ टीकौ।
मनु घूँघट-पट मैं दुरि बैठ्यौ, पारधि रति-पतिही कौ।। [2]
गति मैमंत नाग ज्यौं नागरि, करे कहति हौं लीकौ।
सूरदास-प्रभु बिबिध भाँति करि, मन रिझयौ हरि पो कौ।। [3]

- श्री सूरदास, सूर सागर, राधा-कृष्ण (30)

हे श्री राधे, आपका बदन पूरी तरह से शोभित है। जब तुम इधर-उधर तिरछे देखती हो तो चंद्रमा फीका हो जाता है । [1]
बौहें रूपी धनुष नेन रूपी बाणों को साधे हुए है । मस्तक (सिर) पर केसर का टीका ऐसा जान पड़ रहा है मानो घूँघट के बीच कामदेव का शिकारी छिपकर बैठा हो । [2]
हे नागरि (तुम्हारी) चाल मतवाले हाथी के समान है, (यह सब) लकीर खींचकर कहती हूँ। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) विविध भांति (के श्रिंगार से) प्रिय कृष्ण के मन को (तुमने) पूर्ण रूप से रिझाया है ॥ [3]