।। दोहा।।
अनायास सहजहि जु तिहिं, पाई सुकृत सुमाल।
लग लगाय जग जिहिं जपे, मन बच राधा लाल॥
।। पद ।।
(इकताल)
मन बच राधा लाल जपे जिन।
अनायास सहजहिं या जग में,
सकल सुकृत फल लाभ लह्यौ तिन।। [1]
जप तप तीरथ नेम पुन्य व्रत,
सुभ साधन आराधन ही बिन। [2]
जै श्रीभट अति उतकट जाकी,
महिमा अपरंपार अगम गिन।। [3]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (9)
(दोहा)
जो जीव संसार को विस्मृत कर मन और वाणी से अनन्य भावपूर्वक श्रीराधा-कृष्ण के भजन में लीन रहता है, वह बिना किसी कठोर प्रयास के अनायास ही समस्त पुण्यों और सुकृतों के फल को प्राप्त कर लेता है।
(पद)
जो जीव मन एवं वचनों से श्री राधा कृष्ण का भजन सुमिरन करते हैं वह जीव सहज ही अनायास समस्त सुकृत का फल प्राप्त कर लेते हैं। [1]
श्री राधा कृष्ण का भजन करने वाले जीव जप, तप, तीर्थ, नेम, पुण्य, व्रत एवं साधन किए बिन ही सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं। [2]
श्री भट्ट देवाचार्य जी कहते हैं कि श्री राधा कृष्ण का नित्य, निष्काम एवं अनन्य भजन करने वालों की उत्कृष्ट गति होती है, जिनकी महिमा अपरम्पार एवं वेदों से परे है। [3]
श्री राधा कृष्ण का भजन करने वाले जीव जप, तप, तीर्थ, नेम, पुण्य, व्रत एवं साधन किए बिन ही सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं। [2]
श्री भट्ट देवाचार्य जी कहते हैं कि श्री राधा कृष्ण का नित्य, निष्काम एवं अनन्य भजन करने वालों की उत्कृष्ट गति होती है, जिनकी महिमा अपरम्पार एवं वेदों से परे है। [3]

