जब चितई कजरारे नैननि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (45)

जब चितई कजरारे नैननि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (45)

(राग मारू)
जब चितई कजरारे नैननि ।
बिवस भये मनमोहन घेरे, चहूँ ओर तें प्रेम के मैंननि ।। [1]
मुसिकनि मंद रहे चितवत ही, बस किये लाल मधुर मृदु बैंननि ।
'हित ध्रुव’ रज बंदत अति प्यार सौं , धरति चरन प्यारी जिहि गैंननि ।। [2]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (45)

जब प्रिया ने अंजन-रञ्जित नेत्रों से प्रियतम की ओर दृष्टिपात किया, तो मनमोहन लाल प्रेम-विवश तो हुए ही वरन उनको चारो ओर से प्रेम रूपी कामदेवों ने घेर लिया। [1]
तब तो प्रियतम सुंदरी प्रिया की मंद मुस्कान को देखते ही रह गए, मानो लाडिली ने उन्हें अपनी मृदु एवं मधुर वचनावली से वशवर्ती कर लिया हो । श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि तभी तो प्रियतम अतिशय प्रीतिपूर्वक उस चरण-धूलि की वंदना करते रहते हैं, जिस मार्ग पर प्रिया अपने चरणों को स्थापित करती हुई गमन करती है। [2]