चेला काहू के नहीं - श्री भगवत रसिक,भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रंथ, उत्तरार्ध (40)

चेला काहू के नहीं - श्री भगवत रसिक,भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रंथ, उत्तरार्ध (40)

चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नाहिं ।
सखी लड़ैती लाल की रहै महल के माहिं ।। [1]
रहै महल के माहिं, टहल सब करै निरंतर।
दंपति अति अकुलाहिं, पलक कहुँ परै जु अंतर।। [2]
भगवत भगवत कहै, कर नहिं हम बिन केला ।
ताते हम परिहरे, देहमानी गुरु चेला ।। [3]

- श्री भगवत रसिक,भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रंथ, उत्तरार्ध (40)

न तो हम किसी (देह मानी) के चेला है और नकिसी (देह मानी) के गुरु हम तो अपने प्रिया प्रियतम की भावमयी सखी है। [1]
हम सदा उनके रंगमहल में निवास करते है और निरंतर उनकी टहल किया करते है। प्रिया प्रियतम की भी यह दशा है कि उन्हें हमारे बिना एक पल में ही बेकली होने लगती है। [2]
क्षणभर के लिए भी यदि हम उनकी आँखों से ओझल हो जाएँ तो वे "भगवत" "भगवत" की पुकार मचा देते है और हमारे बिना घडी भर भी नित्यबिहार नहीं कर पाते। (हम क्या करें?) हमने विवश होकर इसीलिए, इन देहाभिमानी गुरु चेलों को त्याग दिया है। [3]