मेरी जीवनमूरि है, रज वृंदावन ऐन।
जुगललाल करुणानिधे, दरसैये इन नैन॥
- श्री ललित किशोरी देव, अभिलाष माधुरी, श्रिंगार शतक (11)
मेरे जीवन की मूल संपदा वृन्दावन की रज है, जिसकी करुणा से मुझे इन नयनों से श्री राधा-कृष्ण के दर्शन संभव हुए हैं।
जुगललाल करुणानिधे, दरसैये इन नैन॥
- श्री ललित किशोरी देव, अभिलाष माधुरी, श्रिंगार शतक (11)
मेरे जीवन की मूल संपदा वृन्दावन की रज है, जिसकी करुणा से मुझे इन नयनों से श्री राधा-कृष्ण के दर्शन संभव हुए हैं।

