मेरौ हरि नागर सौं मन  - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (126)

मेरौ हरि नागर सौं मन - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (126)

(राग गौरी व राग नट)
मेरौ हरि नागर सौं मन मान्यौं ।
अगम निगम पथ छाँड़ि दियौ है भली भई सबरे जग जान्यौं  ।। [1]
मात पिताकी सीख न मांनि, और तजी कुल कान्यौं।
व्यासदास प्रभुके मिलये बिनु, काहि रुचै भोजन पान्यौं।। [2]
 - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (126)

मेरा मन नटवर नागर श्री कृष्ण चंद्र से मान चुका है [अर्थात् अब मैंने उनको अपना सब कुछ बना लिया है]। मैंने अगम [वेदों] और निगम [शास्त्रों] में वर्णित अनेक प्रकार के पंथों को सर्वथा त्याग कर दिया एवं समस्त जग के मोह जंजाल का भी त्याग कर दिया। [1]
मैंने कुल की मर्यादा व लज्जा को त्याग कर, अपने माता पिता द्वारा बताए गए धर्म के विरुध जाकर वृंदावन रस को ही केवल हृदय से धारण किया है क्यूँकि हमारा हृदय अब इसी पर अटक चुका है । श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि बिना प्रभु श्री कृष्ण के मिले हमें न तो भोजन ही अच्छा लगता है और न ही पानी। [2]